अर्थव्यवस्था बढ़ने के बावजूद क्यों गिर रहा है भारत का शेयर बाजार? जानिए 5 बड़े कारण

भारत का शेयर बाजार क्यों गिर रहा है

भारत की अर्थव्यवस्था 7% से अधिक की तेज दर से बढ़ रही है, लेकिन इसके बावजूद देश का शेयर बाजार 2026 में दबाव में है। सेंसेक्स और निफ्टी लगातार आठ सप्ताह तक गिरावट दर्ज कर चुके हैं, जो 25 वर्षों में सबसे लंबी गिरावट की श्रृंखला बताई जा रही है।

निफ्टी में निवेश करने वाले घरेलू निवेशकों की संपत्ति में इस साल करीब 15% की कमी आई है। वहीं, पिछले दो वर्षों में विदेशी संस्थागत निवेशकों ने भारतीय बाजार से करीब 40 अरब डॉलर निकाले हैं। इसके पीछे कई आर्थिक और वैश्विक कारण बताए जा रहे हैं।

कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें

भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरत का 90% से अधिक हिस्सा आयात करता है। मध्य पूर्व में जारी तनाव और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से जुड़े व्यवधानों के कारण कच्चे तेल की कीमतें 90 से 100 डॉलर प्रति बैरल के आसपास बनी हुई हैं।

महंगा तेल भारत के आयात बिल को बढ़ाता है और महंगाई तथा कंपनियों की लागत पर दबाव डालता है। इससे कॉरपोरेट मुनाफे पर भी असर पड़ सकता है।

वैश्विक ब्याज दरों में बढ़ोतरी

ऊंची ऊर्जा कीमतों के कारण महंगाई बढ़ने की चिंता के बीच वैश्विक ब्याज दरें भी बाजार के लिए चुनौती बनी हुई हैं। अमेरिकी सरकारी बॉन्ड पर अधिक रिटर्न मिलने से विदेशी निवेशकों के लिए सुरक्षित अमेरिकी परिसंपत्तियां भारतीय शेयरों की तुलना में अधिक आकर्षक हो सकती हैं।

कमजोर होता रुपया

भारतीय रुपये में कमजोरी विदेशी निवेशकों के रिटर्न को प्रभावित कर रही है। भारतीय शेयरों से स्थानीय मुद्रा में मिलने वाला मुनाफा डॉलर में बदलने पर कम हो सकता है। इससे विदेशी निवेशकों के लिए भारतीय बाजार की आकर्षकता घटती है।

भारतीय शेयरों का मूल्यांकन अभी भी महंगा

बाजार में हालिया गिरावट के बावजूद भारतीय शेयर कई उभरते बाजारों की तुलना में अभी भी महंगे माने जाते हैं। निवेशक अब ऊंची कीमतों के बदले मजबूत कंपनियों की कमाई और बेहतर वृद्धि की उम्मीद कर रहे हैं।

AI की दौड़ में बड़ी वैश्विक कंपनी का अभाव

भारत आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, सेमीकंडक्टर, डेटा सेंटर, रक्षा और डीप-टेक जैसे क्षेत्रों में निवेश बढ़ा रहा है, लेकिन अभी तक देश ने AI क्षेत्र में अमेरिका या चीन जैसी वैश्विक स्तर की बड़ी कंपनी नहीं बनाई है।

फिलहाल घरेलू निवेशक और म्यूचुअल फंड बाजार को सहारा दे रहे हैं। हालांकि, विदेशी निवेश की वापसी के लिए वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी भारतीय कंपनियों का उभरना, ऊर्जा कीमतों में स्थिरता और आर्थिक जोखिमों में कमी महत्वपूर्ण होगी।

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