अच्छा शेयर खरीदने से पहले कौन-कौन से 10 Financial Ratios देखें?

अच्छा शेयर खरीदने से पहले कौन-कौन से Financial Ratios देखें

अच्छा शेयर खरीदने से पहले केवल शेयर की कीमत देखना सही तरीका नहीं है। किसी कंपनी का शेयर ₹100 का हो सकता है और दूसरा शेयर ₹5000 का हो सकता है। फिर भी ₹5000 वाला शेयर सस्ता हो सकता है और ₹100 वाला शेयर महंगा हो सकता है। इसलिए कंपनी की वित्तीय स्थिति और मूल्यांकन को समझना जरूरी है।

अच्छा शेयर खरीदने से पहले कौन-कौन से Financial Ratios देखें यह सवाल हर नए निवेशक के लिए महत्वपूर्ण है। वित्तीय अनुपात कंपनी की लाभप्रदता। कर्ज। कमाई। मूल्यांकन और वित्तीय मजबूती को समझने में मदद करते हैं।

NSE की इक्विटी रिसर्च सामग्री में भी लाभप्रदता। कर्ज। तरलता और मूल्यांकन से जुड़े कई अनुपातों को कंपनी विश्लेषण का महत्वपूर्ण हिस्सा माना गया है।

लेकिन किसी एक अनुपात के आधार पर शेयर खरीदना सही नहीं है। अलग अलग अनुपातों को एक साथ देखकर कंपनी की तस्वीर समझनी चाहिए। साथ ही कंपनी के पिछले वर्षों के आंकड़ों और उसी क्षेत्र की दूसरी कंपनियों से तुलना करना भी जरूरी है।

इस लेख में हम 10 महत्वपूर्ण वित्तीय अनुपातों को आसान भाषा में समझेंगे। हर अनुपात का अर्थ क्या है। इसे कैसे देखना चाहिए और इसकी कौन सी स्थिति निवेशक के लिए चिंता का कारण बन सकती है।

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1. पी ई अनुपात और पी बी अनुपात से शेयर का मूल्यांकन समझें

पी ई अनुपात यानी मूल्य और कमाई का अनुपात किसी शेयर के बाजार भाव की तुलना कंपनी की प्रति शेयर कमाई से करता है। NSE के अनुसार पी ई अनुपात शेयर की कीमत और प्रति शेयर कमाई के बीच संबंध बताता है।

अगर किसी कंपनी का पी ई अनुपात 20 है तो सामान्य अर्थ में निवेशक कंपनी की एक रुपये की कमाई के लिए 20 रुपये का बाजार मूल्य चुका रहे हैं। लेकिन केवल यह देखकर कि पी ई 20 है इसलिए शेयर सस्ता है या महंगा है ऐसा निष्कर्ष नहीं निकालना चाहिए।

पी ई की तुलना उसी क्षेत्र की दूसरी कंपनियों से करना अधिक उपयोगी होता है। तेजी से बढ़ने वाली कंपनी का पी ई अधिक हो सकता है क्योंकि बाजार उससे भविष्य में ज्यादा कमाई की उम्मीद कर रहा होता है। वहीं धीमी वृद्धि वाली कंपनी का पी ई कम हो सकता है।

इसके बहुत कम होने पर भी कंपनी अपने आप आकर्षक नहीं बन जाती। कम पी ई का कारण कमजोर कारोबार। घटती कमाई या भविष्य की खराब संभावनाएं भी हो सकती हैं। इसलिए पी ई के साथ बिक्री वृद्धि और लाभ वृद्धि देखना जरूरी है।

पी बी अनुपात बाजार मूल्य की तुलना कंपनी की प्रति शेयर पुस्तकीय कीमत से करता है। यह विशेष रूप से उन कंपनियों के विश्लेषण में उपयोगी हो सकता है जिनकी संपत्तियों का महत्व अधिक है।

पी ई और पी बी दोनों को कंपनी के क्षेत्र और कारोबार की प्रकृति के अनुसार देखना चाहिए। NSE भी पी ई और पी बी को मूल्यांकन के प्रमुख तरीकों में शामिल करता है।

2. आर ओ ई और आर ओ सी ई से कंपनी की कमाई की क्षमता देखें

आर ओ ई यानी शेयरधारकों की पूंजी पर मिलने वाला प्रतिफल यह बताने में मदद करता है कि कंपनी अपनी मालिकाना पूंजी का इस्तेमाल करके कितना लाभ कमा रही है। इसका उपयोग कंपनी की लाभ कमाने की क्षमता को समझने के लिए किया जाता है। NSE की सामग्री में आर ओ ई को प्रमुख लाभप्रदता अनुपातों में शामिल किया गया है।

अगर किसी कंपनी का आर ओ ई लंबे समय तक अच्छा बना हुआ है तो यह सकारात्मक संकेत हो सकता है। लेकिन केवल एक वर्ष का आर ओ ई देखकर निर्णय नहीं लेना चाहिए। कभी कभी किसी असाधारण लाभ या कम इक्विटी के कारण आर ओ ई असामान्य रूप से ऊंचा दिखाई दे सकता है।

आर ओ सी ई यानी लगाई गई पूंजी पर प्रतिफल कंपनी के कारोबार द्वारा पूंजी के उपयोग की क्षमता को समझने में मदद करता है। यह खासकर पूंजी आधारित कारोबारों में उपयोगी हो सकता है। आर ओ सी ई को कई वर्षों में देखकर कंपनी की संचालन क्षमता को बेहतर तरीके से समझा जा सकता है।

आर ओ ई और आर ओ सी ई के बीच बड़ा अंतर हो तो उसके कारण को समझना जरूरी है। ज्यादा कर्ज के कारण आर ओ ई अच्छा दिखाई दे सकता है जबकि कंपनी की वास्तविक संचालन क्षमता उतनी मजबूत नहीं हो सकती। इसलिए आर ओ ई के साथ कर्ज और आर ओ सी ई को भी देखना चाहिए।

किसी कंपनी का आर ओ ई और आर ओ सी ई लगातार अच्छे स्तर पर रहना उपयोगी संकेत हो सकता है लेकिन कोई एक निश्चित प्रतिशत हर कंपनी के लिए सही नहीं होता। अलग उद्योगों में पूंजी की जरूरत और कारोबार की प्रकृति अलग होती है। इसलिए तुलना हमेशा समान उद्योग की कंपनियों के बीच करना बेहतर है।

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3. डेट टू इक्विटी और ब्याज कवरेज अनुपात से कर्ज का जोखिम समझें

डेट टू इक्विटी अनुपात कंपनी के कर्ज और शेयरधारकों की पूंजी के बीच संबंध बताता है। इसका उपयोग कंपनी पर कर्ज का भार समझने के लिए किया जाता है। भारतीय प्रतिभूति बाजार की निवेश शिक्षा सामग्री में भी इसे वित्तीय उत्तोलन समझने वाला महत्वपूर्ण अनुपात बताया गया है।

कम डेट टू इक्विटी हमेशा अच्छी बात हो सकती है लेकिन इसे कंपनी के कारोबार के संदर्भ में समझना चाहिए। कुछ उद्योगों में कर्ज कारोबार का सामान्य हिस्सा होता है। इसलिए केवल कर्ज देखकर किसी कंपनी को अच्छा या खराब कहना सही नहीं है।

अगर कंपनी का कर्ज लगातार बढ़ रहा है और उसके साथ लाभ तथा नकदी प्रवाह नहीं बढ़ रहे हैं तो यह चिंता का विषय हो सकता है। ब्याज और मूलधन चुकाने की क्षमता कमजोर होने पर कंपनी की वित्तीय स्थिति पर दबाव बढ़ सकता है।

ब्याज कवरेज अनुपात यह समझने में मदद करता है कि कंपनी अपने संचालन से मिलने वाली कमाई से ब्याज खर्च को कितनी आसानी से पूरा कर सकती है। NSE की इक्विटी रिसर्च सामग्री में ब्याज कवरेज अनुपात को कर्ज से जुड़े महत्वपूर्ण अनुपातों में शामिल किया गया है।

कर्ज की जांच करते समय केवल एक वर्ष का आंकड़ा न देखें। पिछले कई वर्षों में कर्ज किस दिशा में गया है यह देखें। साथ में ब्याज खर्च। लाभ और नकदी प्रवाह का रुझान देखें। लगातार बढ़ता कर्ज और कमजोर ब्याज भुगतान क्षमता किसी कंपनी के लिए बड़ा जोखिम बन सकती है।

4. ई पी एस और लाभ मार्जिन से कंपनी की कमाई की गुणवत्ता समझें

ई पी एस यानी प्रति शेयर कमाई बताती है कि कंपनी की कमाई प्रति शेयर के आधार पर कितनी है। भारतीय प्रतिभूति बाजार की निवेश शिक्षा सामग्री के अनुसार ई पी एस कंपनी की प्रति शेयर लाभप्रदता को मापने वाला महत्वपूर्ण संकेतक है।

अगर ई पी एस कई वर्षों में लगातार बढ़ रहा है तो यह कंपनी की कमाई में सुधार का संकेत हो सकता है। लेकिन केवल ई पी एस बढ़ने से कंपनी अच्छी साबित नहीं होती। यह देखना भी जरूरी है कि ई पी एस किस कारण से बढ़ा है।

कभी कंपनी की कुल कमाई बहुत ज्यादा नहीं बढ़ती लेकिन शेयरों की संख्या घटने के कारण प्रति शेयर कमाई बढ़ सकती है। इसलिए ई पी एस के साथ बिक्री और शुद्ध लाभ की वृद्धि भी देखनी चाहिए।

लाभ मार्जिन यह बताने में मदद करता है कि कंपनी अपनी बिक्री से कितना लाभ बचा रही है। अगर बिक्री बढ़ रही है लेकिन लाभ मार्जिन लगातार घट रहा है तो बढ़ती बिक्री का फायदा कम हो सकता है।

अच्छे विश्लेषण में ई पी एस। बिक्री वृद्धि और लाभ मार्जिन को एक साथ देखना चाहिए। अगर बिक्री बढ़ रही है। लाभ बढ़ रहा है और मार्जिन स्थिर या बेहतर हो रहा है तो कारोबार की गुणवत्ता के बारे में ज्यादा स्पष्ट तस्वीर मिल सकती है। NSE भी लाभ मार्जिन और ई पी एस जैसे आंकड़ों को कंपनी विश्लेषण में महत्वपूर्ण मानता है।

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5. करंट अनुपात और क्विक अनुपात से कंपनी की अल्पकालिक वित्तीय स्थिति देखें

करंट अनुपात कंपनी की अल्पकालिक संपत्तियों और अल्पकालिक देनदारियों के बीच संबंध बताता है। इसका उपयोग यह समझने के लिए किया जाता है कि कंपनी अपनी निकट अवधि की देनदारियों को पूरा करने की स्थिति में कैसी है। NSE की सामग्री में करंट अनुपात और क्विक अनुपात को तरलता अनुपातों में शामिल किया गया है।

बहुत कम करंट अनुपात कंपनी की अल्पकालिक वित्तीय स्थिति पर दबाव का संकेत दे सकता है। लेकिन बहुत ज्यादा अनुपात को भी हमेशा अच्छा नहीं माना जाना चाहिए। बहुत अधिक चालू संपत्ति का अर्थ यह हो सकता है कि पूंजी का पर्याप्त उपयोग नहीं हो रहा है।

क्विक अनुपात करंट अनुपात की तुलना में अधिक सावधानी वाला संकेत देता है क्योंकि इसमें ऐसी संपत्तियों को अलग किया जाता है जिन्हें तुरंत नकदी में बदलना कठिन हो सकता है। इससे कंपनी की तत्काल भुगतान क्षमता को समझने में मदद मिल सकती है।

इन दोनों अनुपातों की तुलना पिछले वर्षों से करनी चाहिए। अगर अनुपात लगातार गिर रहा है तो कारण तलाशना जरूरी है। हो सकता है कि कंपनी की देनदारियां तेजी से बढ़ रही हों या उसकी चालू संपत्तियां कमजोर हो रही हों।

करंट अनुपात और क्विक अनुपात का उपयोग विशेष रूप से ऐसी कंपनियों में उपयोगी हो सकता है जहां कार्यशील पूंजी महत्वपूर्ण होती है। लेकिन केवल इन दोनों अनुपातों से शेयर खरीदने का फैसला नहीं करना चाहिए। लाभ। कर्ज और नकदी प्रवाह की स्थिति भी साथ में देखनी चाहिए।

6. नकदी प्रवाह और लाभ के बीच संबंध से असली वित्तीय मजबूती जांचें

वित्तीय अनुपातों के साथ नकदी प्रवाह को देखना बहुत जरूरी है। किसी कंपनी की आय विवरण में लाभ दिखाई दे सकता है लेकिन कारोबार से वास्तविक नकदी का प्रवाह कमजोर हो सकता है। ऐसी स्थिति में निवेशक को अधिक गहराई से जांच करनी चाहिए।

संचालन से नकदी प्रवाह यह समझने में मदद करता है कि कंपनी अपने मुख्य कारोबार से वास्तविक नकदी पैदा कर रही है या नहीं। NSE की उन्नत इक्विटी रिसर्च सामग्री में नकदी प्रवाह विवरण को महत्वपूर्ण माना गया है और नकदी प्रवाह से जुड़े कई अनुपातों को विश्लेषण का हिस्सा बनाया गया है।

अगर कंपनी का लाभ कई वर्षों से बढ़ रहा है लेकिन संचालन से नकदी लगातार कमजोर है तो इसका कारण समझना जरूरी है। कभी कार्यशील पूंजी की जरूरत बढ़ने से ऐसा हो सकता है। लेकिन लगातार बड़ा अंतर चिंता का विषय बन सकता है।

नकदी प्रवाह का विश्लेषण करते समय कंपनी की निवेश गतिविधियों और वित्तीय गतिविधियों को भी समझना चाहिए। भारी कर्ज लेकर नकदी जुटाना और कारोबार से नकदी बनाना दो अलग बातें हैं।

अच्छा शेयर चुनने के लिए केवल अनुपातों की सूची बनाना पर्याप्त नहीं है। वित्तीय विवरणों के बीच संबंध देखना जरूरी है। आय विवरण। तुलन पत्र और नकदी प्रवाह विवरण को साथ में पढ़ने से कंपनी की वास्तविक वित्तीय स्थिति ज्यादा स्पष्ट हो सकती है। NSE के मूलभूत विश्लेषण कार्यक्रम में भी इन तीनों वित्तीय विवरणों के अध्ययन को महत्वपूर्ण माना गया है।

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7. इन 10 अनुपातों को एक साथ देखकर ही शेयर खरीदने का फैसला करें

अच्छा शेयर खरीदने से पहले कौन-कौन से Financial Ratios देखें इसका सही उत्तर केवल एक अनुपात नहीं है। पी ई। पी बी। आर ओ ई। आर ओ सी ई। डेट टू इक्विटी। ब्याज कवरेज। ई पी एस। लाभ मार्जिन। करंट अनुपात और क्विक अनुपात मिलकर कंपनी की अलग अलग तस्वीर दिखाते हैं।

सबसे पहले कंपनी की कमाई और वृद्धि देखें। इसके लिए बिक्री। लाभ और ई पी एस का रुझान समझें। इसके बाद आर ओ ई और आर ओ सी ई से पूंजी के उपयोग की क्षमता देखें। फिर कर्ज और ब्याज भुगतान की स्थिति जांचें।

इसके बाद शेयर का मूल्यांकन देखें। पी ई और पी बी की तुलना समान उद्योग की कंपनियों से करें। अगर कंपनी बहुत अच्छी है लेकिन उसका मूल्यांकन अत्यधिक है तो निवेश में जोखिम बढ़ सकता है। अच्छी कंपनी और अच्छा निवेश हमेशा एक ही बात नहीं होती।

इसके बाद तरलता और नकदी प्रवाह देखें। कंपनी के पास अपने अल्पकालिक दायित्व पूरे करने की क्षमता होनी चाहिए। साथ ही मुख्य कारोबार से पर्याप्त नकदी पैदा हो रही है या नहीं यह भी समझना चाहिए।

अंत में किसी भी अनुपात को अकेले निर्णय का आधार न बनाएं। NSE भी अलग अलग वित्तीय अनुपातों के साथ कंपनी के वित्तीय विवरण और उद्योग आधारित विश्लेषण पर जोर देता है।

FAQs

1. अच्छा शेयर खरीदने से पहले सबसे जरूरी अनुपात कौन सा है?

कोई एक सबसे जरूरी अनुपात नहीं है। पी ई। आर ओ ई। आर ओ सी ई। कर्ज और ई पी एस को साथ में देखना बेहतर है।

2. कितना पी ई अच्छा माना जाता है?

पी ई की कोई एक सही सीमा नहीं है। इसे कंपनी की वृद्धि और उसी उद्योग की दूसरी कंपनियों के साथ तुलना करके देखना चाहिए।

3. क्या ज्यादा आर ओ ई हमेशा अच्छा होता है?

नहीं। ज्यादा कर्ज या कम इक्विटी के कारण भी आर ओ ई बहुत अधिक दिखाई दे सकता है। इसलिए आर ओ ई के साथ कर्ज और आर ओ सी ई भी देखें।

4. डेट टू इक्विटी कितना होना चाहिए?

हर उद्योग के लिए एक समान सीमा नहीं है। कर्ज का स्तर कंपनी के कारोबार और नकदी प्रवाह के संदर्भ में देखना चाहिए।

5. ई पी एस बढ़ना क्यों जरूरी है?

लगातार बढ़ता ई पी एस कंपनी की प्रति शेयर कमाई में सुधार दिखा सकता है। लेकिन ई पी एस की वृद्धि का कारण भी जांचना जरूरी है।

6. क्या कम पी ई वाला शेयर खरीदना चाहिए?

जरूरी नहीं। कम पी ई के पीछे कमजोर कारोबार या भविष्य की खराब उम्मीद भी हो सकती है।

7. आर ओ ई और आर ओ सी ई में क्या अंतर है?

आर ओ ई शेयरधारकों की पूंजी पर मिलने वाले प्रतिफल को समझाता है। आर ओ सी ई कारोबार में लगी पूंजी के उपयोग की क्षमता को समझने में मदद करता है।

8. क्या केवल वित्तीय अनुपात देखकर शेयर खरीदा जा सकता है?

नहीं। कंपनी का कारोबार। प्रबंधन। उद्योग। प्रतिस्पर्धा। नकदी प्रवाह और मूल्यांकन भी देखना चाहिए।

9. शेयर के वित्तीय अनुपात कितने वर्षों के देखने चाहिए?

एक वर्ष का आंकड़ा पर्याप्त नहीं है। संभव हो तो कई वर्षों का रुझान देखकर कंपनी की दिशा समझनी चाहिए।

10. नए निवेशक को शेयर चुनते समय क्या करना चाहिए?

पहले कंपनी का कारोबार समझें। फिर वित्तीय विवरण देखें। उसके बाद अनुपातों की तुलना करें और अंत में मूल्यांकन तथा जोखिम को देखकर फैसला करें।

निष्कर्ष

अच्छा शेयर खरीदने से पहले कौन-कौन से Financial Ratios देखें यह समझना निवेश की मूलभूत प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा है। पी ई और पी बी मूल्यांकन समझने में मदद करते हैं। आर ओ ई और आर ओ सी ई लाभ कमाने की क्षमता दिखाते हैं।

डेट टू इक्विटी और ब्याज कवरेज कर्ज का जोखिम समझाते हैं। ई पी एस और लाभ मार्जिन कमाई की स्थिति बताते हैं। करंट अनुपात और क्विक अनुपात अल्पकालिक वित्तीय स्थिति समझने में मदद करते हैं।

सबसे जरूरी बात यह है कि किसी एक अनुपात के आधार पर शेयर न खरीदें। कई वर्षों के आंकड़े देखें। समान उद्योग की कंपनियों से तुलना करें और वित्तीय विवरणों को भी पढ़ें। इसी तरह किया गया विश्लेषण निवेश के फैसले को केवल शेयर की कीमत देखने की तुलना में ज्यादा मजबूत बना सकता है।

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डिस्क्लेमर: यह लेख केवल शैक्षिक उद्देश्यों के लिए है। शेयर बाजार में ट्रेडिंग अत्यधिक जोखिम के अधीन है। किसी भी वित्तीय निर्णय से पहले अपने वित्तीय सलाहकार से परामर्श जरूर लें।

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